श्री नवग्रह स्तोत्र - सम्पूर्ण पाठ, अन्वय, शब्दार्थ और सरल हिंदी अर्थ

वैदिक ज्योतिष के महासागर में 'श्री नवग्रह स्तोत्र' एक ऐसा प्रकाश-स्तंभ है, जो सदियों से मानवता का मार्ग प्रशस्त कर रहा है। महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित यह स्तोत्र केवल नौ ग्रहों की प्रार्थना मात्र नहीं है, बल्कि यह हमारे जीवन में आने वाली बाधाओं को दूर करने और आंतरिक ऊर्जा को संतुलित करने का एक शक्तिशाली 'साउंड हीलिंग' उपकरण है।

MANTRA

Vidhaa

4/27/20261 min read

जपाकुसुमसंकाशं काश्यपेयं महाद्युतिम्।
तमोऽरिं सर्वपापघ्नं प्रणतोऽस्मि दिवाकरम् ।।1।।

अन्वय: (अहं) जपाकुसुम-संकाशं, काश्यपेयं, महाद्युतिम्, तमोऽरिं, सर्वपापघ्नं, दिवाकरं प्रणतोऽस्मि।

शब्दार्थ: जपाकुसुम-संकाशं: जपा (गुड़हल) के फूल के समान कांति वाले। ; काश्यपेयं: कश्यप ऋषि के पुत्र। ; महाद्युतिम्: महान तेज (प्रकाश) से संपन्न। ; तमोऽरिं: अंधकार के शत्रु। ; सर्वपापघ्नं: सभी पापों का नाश करने वाले। ; दिवाकरं: दिन करने वाले (सूर्य देव को)। ; प्रणतोऽस्मि: प्रणाम करता हूँ।

भावार्थ: जो गुड़हल के फूल की तरह रक्त वर्ण (लाल रंग) की आभा वाले हैं, कश्यप ऋषि के पुत्र हैं, अत्यंत तेजस्वी हैं, अंधकार के शत्रु हैं और जो समस्त पापों को नष्ट करने वाले हैं, उन सूर्य देव (दिवाकर) को मैं प्रणाम करता हूँ।

दधिशंखतुषाराभं क्षीरोदार्णवसम्भवम्।
नमामि शशिनं सोमं शम्भोर्मुकुटभूषणम् ।।2।।

अन्वय: (अहं) दधि-शंख-तुषार-आभं, क्षीरोद-अर्णव-सम्भवम्, शम्भोः मुकुट-भूषणम्, शशिनं सोमं नमामि।

शब्दार्थ: दधि-शंख-तुषार-आभं: दही, शंख और हिम (बर्फ) के समान श्वेत कांति वाले। ; क्षीरोद-अर्णव-सम्भवम्: क्षीर सागर (दूध के समुद्र) से उत्पन्न होने वाले। ; शम्भोः मुकुट-भूषणम्: भगवान शिव के मस्तक के आभूषण। ; शशिनं: चंद्रमा (जिनमें शश/खरगोश का चिह्न हो)। ; सोमं: अमृत स्वरूप सोमदेव। ; नमामि: नमस्कार करता हूँ।

भावार्थ: जो दही, शंख और हिम के समान धवल (सफेद) आभा वाले हैं, जिनकी उत्पत्ति क्षीर सागर से हुई है, जो भगवान शिव के मस्तक के आभूषण हैं, उन चंद्रमा (सोम देव) को मैं प्रणाम करता हूँ।

धरणीगर्भसम्भूतं विद्युत्कान्तिसमप्रभम्।
कुमारं शक्ति हस्तं तं मंगलं प्रणमाम्यहम् ।।3।।

अन्वय: (अहं) धरणी-गर्भ-सम्भूतं, विद्युत्-कान्ति-सम-प्रभम्, शक्ति-हस्तं, कुमारं, तं मङ्गलं प्रणमामि।

शब्दार्थ: धरणी-गर्भ-सम्भूतं: पृथ्वी के गर्भ से उत्पन्न हुए। ; विद्युत्-कान्ति-सम-प्रभम्: बिजली की चमक के समान प्रभा (चमक) वाले। ; शक्ति-हस्तं: जिनके हाथ में 'शक्ति' (एक विशेष अस्त्र) है। ; कुमारं: युवा रूप वाले (मंगल देव को कुमार भी कहा जाता है)। ; तं मङ्गलं: उन मंगल देव को। ; प्रणमामि: प्रणाम करता हूँ।

भावार्थ: जो पृथ्वी के गर्भ से उत्पन्न हुए हैं, जिनकी चमक बिजली के समान तेजस्वी है, जो हाथों में शक्ति अस्त्र धारण करने वाले कुमार स्वरूप हैं, उन मंगल देव को मैं प्रणाम करता हूँ।

प्रियंगुकलिकाश्यामं रूपेणाप्रतिमं बुधम्।
सौम्यं सौम्यगुणोपेतं तं बुधं प्रणमाम्यहम् ।।4।।

अन्वय: (अहं) प्रियंगु-कलिका-श्यामं, रूपेण अप्रतिमं, सौम्यं, सौम्य-गुण-उपेतं, बुधं, तं बुधं प्रणमामि।

शब्दार्थ: प्रियंगु-कलिका-श्यामं: प्रियंगु (एक औषधीय लता) की कली के समान श्याम वर्ण (हरे-काले रंग) वाले। ; रूपेण अप्रतिमं: जिनका रूप अद्वितीय (बेजोड़) है। ; सौम्यं: अत्यंत शांत और मनोहर स्वभाव वाले। ; सौम्य-गुण-उपेतं: चंद्रमा के पुत्र होने के कारण शुभ/सौम्य गुणों से युक्त। ; बुधम्: बुद्धि के अधिष्ठाता। ; तं बुधं: उन बुध देव को। ; प्रणमाम्यहम्: मैं प्रणाम करता हूँ।

भावार्थ: जो प्रियंगु की कली के समान गहरे श्याम वर्ण वाले हैं, जिनका रूप सौंदर्य अतुलनीय है, जो स्वभाव से अत्यंत शांत हैं और चंद्रमा के सभी सौम्य गुणों से संपन्न हैं, उन बुद्धि के दाता बुध देव को मैं प्रणाम करता हूँ।

देवानां च ऋषीणां च गुरुं कांचनसन्निभम्।
बुद्धिभूतं त्रिलोकेशं तं नमामि बृहस्पतिम् ।।5।।

अन्वय: (अहं) देवानां च ऋषीणां च गुरुं, काञ्चन-सन्निभम्, बुद्धि-भूतं, त्रिलोकेशं, तं बृहस्पतिं नमामि।

शब्दार्थ: देवानां च ऋषीणां च: देवताओं और ऋषियों के। ; गुरुं: शिक्षक या मार्गदर्शक। ; काञ्चन-सन्निभम्: स्वर्ण (सोने) के समान चमकने वाले। ; बुद्धि-भूतं: बुद्धि के भंडार या बुद्धि के साक्षात् स्वरूप। ; त्रिलोकेशं: तीनों लोकों के स्वामी। ; तं बृहस्पतिं: उन बृहस्पति देव को। ; नमामि: नमस्कार करता हूँ।

भावार्थ: जो देवताओं और ऋषियों के गुरु हैं, जिनकी आभा कंचन (सोने) के समान दैदीप्यमान है, जो बुद्धि के स्वामी और तीनों लोकों के ईश्वर हैं, उन बृहस्पति देव को मैं प्रणाम करता हूँ।

हिमकुन्दमृणालाभं दैत्यानां परमं गुरुम्।
सर्वशास्त्र प्रवक्तारं भार्गवं प्रणमाम्यहम् ।।6।।

अन्वय: (अहं) हिम-कुन्द-मृणाल-आभं, दैत्यानां परमं गुरुं, सर्व-शास्त्र-प्रवक्तारं, भार्गवं प्रणमामि।

शब्दार्थ: हिम-कुन्द-मृणाल-आभं: बर्फ (हिम), कुन्द के फूल और कमल की डंडी (मृणाल) के समान श्वेत कांति वाले। ; दैत्यानां परमं गुरुम्: दैत्यों (असुरों) के सर्वश्रेष्ठ गुरु। ; सर्व-शास्त्र-प्रवक्तारं: सभी शास्त्रों के ज्ञाता और उनका उपदेश देने वाले। ; भार्गवं: महर्षि भृगु के पुत्र (शुक्राचार्य)। ; प्रणमाम्यहम्: मैं प्रणाम करता हूँ।

भावार्थ: जो बर्फ, कुन्द के पुष्प और कमल की डंडी के समान धवल (सफेद) वर्ण वाले हैं, जो दैत्यों के परम गुरु हैं और समस्त शास्त्रों के अद्वितीय प्रवक्ता हैं, उन भृगु नंदन शुक्र देव को मैं प्रणाम करता हूँ।

नीलांजनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम्।
छायामार्तण्डसम्भूतं तं नमामि शनैश्चरम् ।।7।।

अन्वय: (अहं) नीलाञ्जन-समाभासं, रवि-पुत्रं, यम-अग्रजं, छाया-मार्तण्ड-सम्भूतं, तं शनैश्चरं नमामि।

शब्दार्थ: नीलाञ्जन-समाभासं: नीले अंजन (काजल) के समान आभा (कांति) वाले। ; रवि-पुत्रं: सूर्य देव के पुत्र। ; यम-अग्रजं: यमराज के बड़े भाई। ; छाया-मार्तण्ड-सम्भूतं: छाया और मार्तण्ड (सूर्य) से उत्पन्न होने वाले। ; तं शनैश्चरं: उन धीरे चलने वाले (शनि देव) को। ; नमामि: नमस्कार करता हूँ।

भावार्थ: जो नीले काजल के समान गहरी चमक वाले हैं, सूर्य देव के पुत्र और यमराज के बड़े भाई हैं, तथा जिनका जन्म सूर्य की पत्नी छाया के गर्भ से हुआ है, उन मन्द गति से चलने वाले शनि देव को मैं प्रणाम करता हूँ।

अर्धकायं महावीर्यं चन्द्रादित्यविमर्दनम्।
सिंहिकागर्भसम्भूतं तं राहुं प्रणमामयम् ।।8।।

अन्वय: (अहं) अर्ध-कायं, महा-वीर्यं, चन्द्र-आदित्य-विमर्दनम्, सिंहिका-गर्भ-सम्भूतं, तं राहुं प्रणमामि।

शब्दार्थ: अर्ध-कायं: आधे शरीर वाले। ; महा-वीर्यं: महान बल (पराक्रम) से संपन्न। ; चन्द्र-आदित्य-विमर्दनम्: चन्द्रमा और सूर्य को पीड़ित करने वाले (ग्रहण के समय)। ; सिंहिका-गर्भ-सम्भूतं: सिंहिका के गर्भ से उत्पन्न हुए। ; तं राहुं: उन राहु देव को। ; प्रणमामि: प्रणाम करता हूँ।

भावार्थ: जिनका केवल आधा शरीर है, जो अत्यंत पराक्रमी हैं, जो अपने बल से सूर्य और चंद्रमा को भी ग्रस (पीड़ित) लेते हैं तथा जिनका जन्म सिंहिका के गर्भ से हुआ है, उन राहु देव को मैं प्रणाम करता हूँ।

पलाशपुष्पसंकाशं तारकाग्रहमस्तकम्।
रौद्रं रौद्रात्मकं घोरं तं केतुं प्रणमाम्यहम् ।।9।।

अन्वय: (अहं) पलाश-पुष्प-संकाशं, तारका-ग्रह-मस्तकं, रौद्रं, रौद्रात्मकं, घोरं, तं केतुं प्रणमामि।

शब्दार्थ: पलाश-पुष्प-संकाशं: पलाश (टेसू) के फूल के समान गहरे लाल वर्ण वाले। ; तारका-ग्रह-मस्तकं: नक्षत्रों और ग्रहों में प्रधान (शिखा स्वरूप)। ; रौद्रं: क्रोध युक्त स्वरूप वाले। ; रौद्रात्मकं: साक्षात् रुद्र (शिव) के अंश से युक्त। ; घोरं: भयानक या अत्यंत उग्र रूप वाले। ; तं केतुं: उन केतु देव को। ; प्रणमाम्यहम्: मैं प्रणाम करता हूँ।

भावार्थ: जो पलाश के पुष्प की भांति रक्त वर्ण (लाल रंग) वाले हैं, जो नक्षत्रों और ग्रहों के सिरमौर हैं, जो स्वयं रौद्र रूप हैं और भगवान रुद्र के स्वभाव वाले तथा अत्यंत भयानक हैं, उन केतु देव को मैं प्रणाम करता हूँ।

इति व्यासमुखोद्गीतं यः पठेत्सुसमाहितः।
दिवा वा यदि वा रात्रौ विघ्नशान्तिर्भविष्यति ।।10।।

अन्वय: यः सुसमाहितः (सन्) इति व्यास-मुख-उद्गीतं दिवा वा यदि वा रात्रौ पठेत्, (तस्य) विघ्न-शान्तिः भविष्यति।

शब्दार्थ: इति: इस प्रकार। ; व्यास-मुख-उद्गीतं: महर्षि व्यास के मुख से गाए हुए (रचित)। ; यः पठेत्: जो पढ़ता है। ; सुसमाहितः: अत्यंत एकाग्रचित्त या सावधान होकर। ; दिवा वा यदि वा रात्रौ: दिन में अथवा रात्रि में। ; विघ्नशान्तिर्भविष्यति: (उसके सभी) विघ्नों की शांति होगी।

भावार्थ: जो मनुष्य महर्षि व्यास के मुख से निकले हुए इस (नवग्रह स्तोत्र) का पूर्ण एकाग्रता के साथ दिन में या रात में पाठ करता है, उसके जीवन की समस्त बाधाओं और विघ्नों का नाश हो जाता है।

नरनारी नृपाणांच भवेत् दुःस्वप्ननाशनम्I
ऐश्वर्यमतुलं तेषां आरोग्यं पुष्टिवर्धनम् ।।11।।

अन्वय: (एतस्य पाठेन) नर-नारी-नृपाणां च दुःस्वप्न-नाशनं भवेत्, तेषाम् अतुलम् ऐश्वर्यम् आरोग्यं पुष्टि-वर्धनं (च भविष्यति)।

शब्दार्थ: नर-नारी-नृपाणां: पुरुषों, स्त्रियों और राजाओं (शासकों) के। ; भवेत् दुःस्वप्ननाशनम्: बुरे स्वप्नों (और उनके दुष्प्रभावों) का नाश होता है। ; ऐश्वर्यमतुलं: अतुलनीय ऐश्वर्य (धन-संपत्ति और वैभव)। ; तेषां: उन्हें/उनका। ; आरोग्यं: उत्तम स्वास्थ्य (रोगों से मुक्ति)। ; पुष्टिवर्धनम्: शक्ति, समृद्धि और पोषण की वृद्धि करने वाला।

भावार्थ: इस स्तोत्र का पाठ करने वाले स्त्री, पुरुष और राजाओं के बुरे स्वप्नों का प्रभाव नष्ट हो जाता है। उन्हें अनुपम ऐश्वर्य प्राप्त होता है और यह स्तोत्र उनके आरोग्य (स्वास्थ्य) तथा बल-समृद्धि की वृद्धि करने वाला है।

ग्रहनक्षत्रजाः पीडास्तस्कराग्निसमुभ्दवाःI
ता सर्वाःप्रशमं यान्ति व्यासोब्रुते न संशयः ।।12।।

अन्वय: ग्रह-नक्षत्र-जाः, तस्कर-अग्नि-समुद्भवाः (च) ताः सर्वाः पीडाः प्रशमं यान्ति, (इति) व्यासः ब्रूते, न संशयः।

शब्दार्थ: ग्रह-नक्षत्र-जाः: ग्रहों और नक्षत्रों (की प्रतिकूल स्थिति) से उत्पन्न। ; पीडास्तस्कर-अग्नि-समुद्भवाः: (पीडाः + तस्कर + अग्नि) पीड़ाएं जो चोरों और अग्नि के भय से उत्पन्न हुई हों। ; ता सर्वाः: वे सभी। ; प्रशमं यान्ति: शांत हो जाती हैं (शमित हो जाती हैं)। ; व्यासोब्रुते: व्यास ऋषि कहते हैं। ; न संशयः: इसमें कोई संदेह नहीं है।

भावार्थ: महर्षि व्यास कहते हैं कि ग्रहों और नक्षत्रों की प्रतिकूलता से होने वाले कष्ट, तथा चोर, अग्नि या अन्य आकस्मिक दुर्घटनाओं से उत्पन्न होने वाली सभी बाधाएं इस स्तोत्र के प्रभाव से शांत हो जाती हैं। इस कथन में तनिक भी संदेह नहीं है।

II इति श्रीव्यास विरचितम् आदित्यादी नवग्रह स्तोत्रं संपूर्णं II

अन्वय: इति व्यास-विरचितम् आदित्यादी-नवग्रह-स्तोत्रं सम्पूर्णम्।

शब्दार्थ: इति: यहाँ पर, इस प्रकार (समाप्ति का सूचक)। ; व्यास-विरचितम्: महर्षि वेदव्यास द्वारा रचा गया। ; आदित्यादी: सूर्य (आदित्य) आदि। ; नवग्रह-स्तोत्रं: नौ ग्रहों की स्तुति। ; सम्पूर्णम्: पूर्ण हुआ।

भावार्थ: इस प्रकार महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित सूर्य आदि नवग्रहों की स्तुति (नवग्रह स्तोत्र) यहाँ पूर्ण होती है।